काव्य गुण परिभाषा एवं भेद

काव्य गुण परिभाषा एवं भेद

काव्य गुण परिभाषा एवं भेद, काव्य गुण क्या हैं?, काव्य-गुणों की संख्या, गुण किसे कहते हैं? प्रसाद गुण, ओज गुण, माधुर्य गुण

काव्य के सौंदर्य की वृद्धि करने वाले और उसमें अनिवार्य रूप से विद्यमान रहने वाले धर्म को गुण कहते हैं।

आचार्य वामन द्वारा

प्रवर्तित रीति सम्प्रदाय को ही गुण सम्प्रदाय भी कहा नाता है आचार्य वामन ने गुण को स्पष्ट करते हुए स्वरचित ‘काव्यालंकार सूत्रवृत्ति’ ग्रंथ में लिखा है-
“काव्यशोभायाः कर्तारो धर्मा: गुणाः।
तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः ॥”
अर्थात् शब्द और अर्थ के शोभाकारक धर्म को गुण कहा जाता है वामन के अनुसार गुण’ का इनको अनुपस्थिति में काव्य का अस्तित्व असंभव है।

काव्य गुण परिभाषा एवं भेद
काव्य गुण परिभाषा एवं भेद

डॉ नगेन्द्र के अनुसार–

“गुण काव्य के उन उत्कर्ष साधक तत्वों को कहते हैं जो मुख्य रूप से रस के और गौण रूप से शब्दार्थ के नित्य धर्म हैं|”

गुण के भेद

भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में निम्नलिखित दस गुण स्वीकार किये है-

“श्लेष: प्रसाद: समता समधि
माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम्।।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च,
कान्तिश्च काव्यस्य गुणाः दशैते।”

अर्थात् काव्य में निम्न दस गुण होते हैं-

श्लेष

प्रसाद

समता

समाधि

माधुर्य

ओज

पदसौकुमार्य

अर्थव्यक्ति

उदारता

कांति

भरत के पश्चात भामह ने भी दस को स्वीकार किए हैं तथा प्रसाद और माधुर्य की सर्वाधिक प्रशंसा की है।

भामह के पश्चात दंडी ने भी भारत के अनुसार ही दस गुण स्वीकार की है।

दंडी के बाद वामन ने मुख्य दो प्रकार के गुण माने हैं- शब्द गुण एवं अर्थ गुण।

वामन ने दोनों गुणों में प्रत्येक के दस-दस भेद किए हैं।

वामन के पश्चात आचार्य भोजराज ने अपने सरस्वती कंठाभरण में सर्वाधिक 48 गुण, 24 शब्द गुण तथा 24 अर्थ गुण स्वीकार किए हैं।

उन्होंने शब्द गुणों को बाह्यगुण तथा अर्थ गुणों को अभ्यंतर गुण कहा था।

अग्नि पुराण में 19 काव्य गुण स्वीकार किए गए हैं।

इसके पश्चात आचार्य मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश में तीन गुण स्वीकार की है- 1. प्रसाद 2. ओज 3. माधुर्य।

आचार्य विश्वनाथ ने ‘साहित्य दर्पण’ में तथा पंडितराज जगन्नाथ ने ‘रसगंगाधर’ में उक्त तीन गुणों को स्वीकार किया है।

प्रसाद गुण

ऐसी काव्य रचना जिसको पढ़ते ही अर्थ ग्रहण हो जाता है।

वह प्रसाद गुणों से युक्त मानी जाती है अर्थात् जब बिना किसी विशेष प्रयास के काव्य का अर्थ स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है उसे प्रसाद गुण युक्त काव्य कहते हैं।

स्वच्छता एवं स्पष्टता प्रसाद गुण की विशेषता मानी जाती है।

यह समस्त रचनाओं और रसों में रहता है।

इसमें आए शब्द सुनते ही अर्थ के द्योतक होते हैं।

आचार्य भिखारीदास ने प्रसाद गुण का लक्षण इस प्रकार प्रकट किया है:-

“मन रोचक अक्षर परै, सोहे सिथिल शरीर।
गुण प्रसाद जल सूक्ति ज्यों, प्रगट अरथ गंभीर।॥” जैसे:-

“हे प्रभु आनंद दाता ज्ञान हमको दीजिए,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए,

लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें,
ब्रह्मचारी धर्म रक्षक वीर व्रत धारी बने।”

“जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।”

“जिसकी रज में लोट लोट कर बड़े हुए हैं।

घुटनों के बल सरक सरक कर खड़े हुए हैं।

परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये।

जिसके कारण ‘धूल भरे हीरे’ कहलाये।

हम खेले कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में।
हे मातृभूमि तुझको निरख मग्न क्यों न हो मोद में।।”

“चारु चन्द्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल थल में।
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अम्बर तल में ।”

“वह आता
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठीभर दाने को, भूख मिटाने को
मुँह फटी-पुरानी झोली को फैलाता।।”
– “जीवन भर आतप सह वसुधा पर छाया करता है।”
तुच्छ पत्र की भी स्वकर्म में कैसी तत्परता है।”

“विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना।
परिचय इतना इतिहास यही ,
उमड़ी कल थी मिट आज चली।।”

ओज गुण

ऐसी कवि रचना जिसको पढ़ने उसे चित्त में जोश वीरता उल्लास आदि के भाव उत्पन्न हो जाए वह ओज गुण युक्त काव्य रचना मानी जाती है।

गौड़ी रीति की तरह इसमें संयुक्ताक्षरों ‘ट’ वर्गीय वर्णों लंबे-लंबे सामासिक पदों एवं रेफ युक्त वर्णों का प्रयोग अधिक किया जाता है।

वीर, रौद्र, भयानक, वीभत्स आदि रसो की रचना में ओज गुण ही पाया जाता है।

आचार्य भिखारीदास ने इसका लक्षण इस प्रकार प्रकट किया है-
‘उद्धत अच्छर जहँ भरै, स, क, ट युत मिलिआइ।
ताहि ओज गुण कहत हैं, जे प्रवीन कविराइ ।।”

“किस ने धनुष तोड़ा शशि शेखर का।
मेरे नेत्र देखो राघव सवंश डूब जाओगे इनमें।”
– ” मैं सत्य कहता हूँ सखे ! सुकुमार मत जानी मुझे।
यमराज से भी युद्ध में, प्रस्तुत सदा जानो मुझे।

हे सारथे ! हैं द्रोण क्या? आवें स्वयं देवेन्द्र भी।
वे भी न जीतेंगे समर में, आज क्या मुझसे कभी।।”

“देशभक्त वीरों मरने से नेक नहीं डरना होगा।
प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।।”

“भये क्रुद्ध जुद्ध विरुद्ध रघुपति, त्रोय सायक कसमसे।
कोदण्ड धुनि अति चण्ड सुनि, मनुजाद सब मारुत ग्रसे।।”

“दिल्लिय दहन दबाय करि सिप सरजा निरसंक।
लूटि लियो सूरति सहर बंकक्करि अति डंक।।”

“बुंदेले हर बोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।”

“हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुध्द शुध्द भारती।
स्वयं प्रभा, समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।”

“हाय रुण्ड गिरे, गज झुण्ड गिरे, फट-फट अवनि पर शुण्ड गिरे।
भू पर हय विकल वितुण्ड गिरे, लड़ते-लड़ते अरि झुण्ड गिरे।”

माधुर्य गुण

हृदय को आनंद उल्लास से द्रवित करने वाली कोमल कांत पदावली से युक्त रचना माधुर्य गुण संपन्न होती है।

अर्थात् ऐसी काव्य रचना जिसको पढ़ कर चित में श्रृंगार, करुण, शांति के भाव उत्पन्न होते हैं।

वह माधुर्य गुण युक्त रचना मानी जाती है।
वैदर्भी रीति की तरह इसमें संयुक्ताक्षर ‘ट’ वर्गीय वर्णों एवं सामासिक पदों का पूर्ण अभाव पाया जाता है अथवा अल्प प्रयोग किया जाता है।

श्रृंगार, हास्य, करुण, शांतादि रसों से युक्त रचनाओं में माधुर्य गुण पाया जाता है।

आचार्य भिखारीदास ने इसका लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत किया है:-

अनुस्वार और वर्गयुत, सबै वरन अटवर्ग। अच्छा मैं मृदु परै, सौ माधुर्य निसर्ग।।

“अमि हलाहल मद भरे, श्वेत श्याम रतनार ।
जियत मिरत झुकि-झुकि परत, जे चितवत इक बार ।।”

“कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि, कहत लखन सम राम हृदय गुनि मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्हि, मनसा विश्व विजय कर लीन्हि ।।”

“बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनि हसै, देन कहि नटि जाय।।”

“कहत नटत रीझत खीझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैनन ही सौं बात।।”

“मेरे हृदय के हर्ष हा! अभिमन्यु अब तू है कहाँ।
दृग खोलकर बेटा तनिक तो देख हम सबको यहाँ।

मामा खड़े हैं पास तेरे तू यहीं पर है पड़ा। निज गुरुजनों के मान का तो ध्यान था तुझको बड़ा।।”

“बिनु गोपाल बैरिन भई कुंजैं |
तब ये लता लगती अति सीतल,
अब भई विषम ज्वाल की पुंजैं | |”

“फटा हुआ है नील वसन क्या, ओ यौवन की मतवाली ।
देख अकिंचन जगत लूटता, छवि तेरी भोली भाली ।।”

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