आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य

आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य

आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य के अंतर्गत आदिकालीन अपभ्रंश के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं पढने के साथ-साथ आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य की विशेषताएं एवं प्रमुख प्रवृत्तियां आदि भी जानेंगे।

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डॉ. हरदेव बाहरी ने सातवीं शती से ग्यारहवीं शती के अंत तक के काल को ‘अपभ्रंश का स्वर्णकाल’ माना है।

अपभ्रंश में तीन प्रकार के बंध मिलते हैं-

1. दोहा बंध 2. पद्धड़िया बंध 3. गेय पद बंध।

पद्धरी एक छंद विशेष है, जिसमें 16 मात्राएँ होती है। इसमें लिखे जाने वाले काव्यों को पद्धड़िया बंद कहा गया है।

अपभ्रंश का चरित काव्य पद्धड़िया बंध में लिखा गया है।

चरित काव्यों में पद्धड़िया छंद की आठ-आठ पंक्तियों के बाद धत्ता दिया रहता है, जिसे ‘कड़वक‘ कहते हैं।

जोइन्दु (योगेन्दु) छठी शती

रचनाएँ 1. परमात्म प्रकाश तथा 2. योगसार।

उक्त रचनाओं से ही अपभ्रंश से दोहे की शुरुआत मिलती है।

जोइन्दु से दोहा छंद का आरंभ माना गया है।

स्वयंभू (783 ई.)

स्वयंभू को जैन परंपरा का प्रथम कवि माना जाता है।

इनके तीन ग्रंथ माने जाते हैं-

1. पउम चरिउ (अपूर्ण)― 5 कांड तथा 83 संधियों वाला विशाल महाकाव्य है। यह अपभ्रंश का आदिकाव्य माना जाता है।
‘पउम चरिउ’ के अंत में राम को मुनीन्द्र से उपदेश के बाद निर्वाण प्राप्त करते दिखाया गया है।

2. रिट्ठेमणि चरिउ (कृष्ण काव्य)

3. स्वयंभू छंद।

उपाधि― कविराज – स्वयं द्वारा

छंदस् चूड़ामणि – त्रिभुवन

अपभ्रंश का वाल्मीकि – डॉ राहुल सांकृत्यायन

अपभ्रंश का कालिदास – डॉ हरिवल्लभ चुन्नीलाल भयाणी

‘पउम चरिउ’ को स्वयंभू के पुत्र त्रिभुवन ने पूरा किया।

अपभ्रंश में कृष्ण काव्य के आरंभ का श्रेय भी स्वयंभू को ही दिया जाता है।

स्वयंभू ने चतुर्मुख को पद्धड़िया छंद का प्रवर्तक और श्रेष्ठ कवि कहा है।

स्वयंभू ने अपनी भाषा को ‘देशीभाषा’ कहा है।

पुष्यदंत

यह राम काव्य के दूसरे प्रसिद्ध कवि थे।

ये मूलतः शैव थे, परंतु बाद में अपने आश्रयदाता के अनुरोध से जैन हो गए थे।

इनके समय को लेकर विवाद है। शिवसिंह सेंगर ने सातवीं शताब्दी और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने नौवीं शताब्दी माना। अंतः साक्ष्य के आधार पर

सामान्यतः 972 ई. (10वीं शती) इनका समय माना जाता है।

रचनाएँ-

1. तिरसठी महापुरिस गुणालंकार (महापुराण) – इसमें में 63 महापुरुषों का जीवन चरित है।

2. णयकुमारचरिउ (नागकुमार चरित्र)

3. जसहर-चरिउ (यशधर चरित्र)।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनके दो और ग्रंथों का उल्लेख किया है—

1. आदि पुराण

2. उत्तर पुराण

इन दोनों को चौपाइयों में रचित बताया है।

चरित काव्यों में चौपाई छंद का प्रयोग किया है।

अपभ्रंश में यह 15 मात्राओं का छंद था।

उपाधियाँ—

अभिमान मेरु/सुमेरु – स्वयं द्वारा

काव्य रत्नाकार – स्वयं द्वारा

कविकुल तिलक – स्वयं द्वारा

अपभ्रंश का भवभूति – डॉ. हरिवल्लभ चुन्नीलाल भयाणी।

इन्हें अपभ्रंश का व्यास/वेदव्यास कहा जाता है।

इन्हें ‘सरस्वती निलय’ भी कहा जाता है।

यह स्वभाव से अक्खड़ थे तथा इनमें सांप्रदायिकता के प्रति जबरदस्त आग्रह था।‌

शिवसिंह सेंगर ने इन्हें ‘भाखा की जड़‘ कहा है।

धनपाल

दसवीं शती (933ई.) में ‘भविसयत्तकहा‘ की रचना की।

इन्हें मुंज ने ‘सरस्वती‘ की उपाधि दी थी।

‘भविसयत्तकहा’ का संपादन डॉ. याकोबी ने किया था।

जिनदत्त सूरि

इन्होंने अपने ग्रंथ ‘उपदेशरसायनरास’ (1114 ई.) से रास काव्य परंपरा का प्रवर्तन किया।

यह 80 पद्यों का नृत्य गीत रासलीला काव्य है।

अब्दुल रहमान (अद्दहमाण)

रचना- ‘संदेशरासक’ — देशी भाषा में किसी मुसलमान कवि द्वारा रचित प्रथम ग्रंथ था।

‘संदेशरासक’ में विक्रमपुर की एक वियोगिनी की व्यथा वर्णित हुई है।

इस खंडकाव्य का समय 12वीं शती उत्तरार्द्ध या 13वीं शती पूर्वार्द्ध माना गया है।

यह प्रथम जनकाव्य है।

विश्वनाथ त्रिपाठी ने इसकी भाषा को ‘संक्रातिकालीन भाषा’ कहा है।

मुनि रामसिंह

इन्हे अपभ्रंश का सर्वश्रेष्ठ रहस्यवादी कवि माना जाता है।

रचना- ‘पाहुड़ दोहा’

हेमचंद्र

इनका वास्तविक नाम चंगदेव था।

प्राकृत का पाणिनि कहा जाता है।

इन्होंने गुजरात के सोलंकी शासक सिद्धराज जयसिंह के आग्रह पर ‘हेमचंद्र शब्दानुशासन’ शीर्षक से व्याकरण ग्रंथ लिखा।

इस ग्रंथ में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश तीनों भाषाओं का समावेश है।

अन्य रचनाएं – कुमारपाल चरित्र (प्राकृत) पुरुष चरित्र

देशीनाम माला।

आदिकालीन अपभ्रंश साहित्य

सोमप्रभ सूरि

रचना – ‘कुमारपालप्रतिबोध’ (1184 ई.) गद्यपद्यमय संस्कृत प्राकृत काव्य है।

मेरुतुंग

रचना – ‘प्रबंध चिंतामणि’ (1304 ई.)

संस्कृत भाषा का ग्रंथ है, किंतु इसमें ‘दूहा विद्या’ विवाद-प्रसंग मिलता है।

प्राकृत पैंगलम

इसमें विद्याधर, शारंगधर, जज्जल, बब्बर आदि कवियों की रचनाएँ मिलती हैं।

इसका संग्रह 14वीं शती के अंत लक्ष्मीधर ने किया था।

‘प्राकृत पैंगलम‘ में वर्णित 8 छंदों के आधार पर आचार्य शुक्ल ने ‘हम्मीर रासो‘ की कल्पना की व इसके रचयिता शारंगधर को माना है।

डॉ राहुल सांकृत्यायन ने ‘हम्मीर रासो’ के रचयिता जज्जल नमक कवि को माना है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार ‘हम्मीर’ शब्द किसी पात्र का नाम ना होकर विशेषण है जो अमीर का विकृत रूप है।

डॉक्टर बच्चन सिंह ने शारंगधर को अनुमानतः ‘कुंडलिया छंद’ का प्रथम प्रयोक्ता माना है।

रीतिकाल की पूरी जानकारी

रीतिकाल के ध्वनि ग्रंथ

नायक-नायिका भेद संबंधी रीतिकालीन काव्य-ग्रंथ

रीतिकालीन छंदशास्त्र संबंधी ग्रंथ

पर्यायवाची शब्द (महा भण्डार)

रीतिकाल के राष्ट्रकवि भूषण का जीवन परिचय एवं साहित्य परिचय

अरस्तु और अनुकरण

कल्पना अर्थ एवं स्वरूप

राघवयादवीयम् ग्रन्थ

भाषायी दक्षता

हालावाद विशेष

संस्मरण और रेखाचित्र

कामायनी के विषय में कथन

कामायनी महाकाव्य की जानकारी

आदिकाल Aadikal का सामान्य परिचय

आदिकाल Aadikal का सामान्य परिचय

इस पोस्ट में आदिकाल Aadikal का सामान्य परिचय, हिंदी का प्रथम कवि, हिंदी का प्रथम ग्रंथ, आदिकाल से संबंधित विभिन्न विद्वानों के प्रमुख कथन एवं महत्त्वपूर्ण कथन शामिल हैं।

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आदिकाल का नामकरण — प्रस्तोता

चारण काल — जॉर्ज ग्रियर्सन

प्रारंभिक काल — मिश्रबंधु, डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त

बीजवपन काल — आ. महावीरप्रसाद द्विवेदी

वीरगाथाकाल — आ. रामचंद्र शुक्ल

सिद्ध-सामत काल — महापंडित राहुल सांकृत्यायन

वीरकाल — आ. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

संधिकाल एवं चारण काल — डॉ. रामकुमार वर्मा

आदिकाल — आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी

जय काल — डॉ. रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’

आधार काल — सुमन राजे

अपभ्रंश काल — डॉ. धीरेंद्र वर्मा, डॉ. चंद्रधर शर्मा गुलेरी

अपभ्रंश काल (जातीय साहित्य का उदय) — डॉ. बच्चन सिंह

उद्भव काल — डॉ. वासुदेव सिंह

सर्वमान्य मत के अनुसार आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा सुझाए गए नाम ‘आदिकाल’ को स्वीकार किया गया है।

हिंदी का प्रथम कवि

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने ‘सरहपा/ सरहपाद’ को हिंदी का प्रथम कवि स्वीकार किया है। सामान्यतया उक्त मत को स्वीकार किया जाता है।

हिंदी का प्रथम कवि कौन हो सकता है, इस संबंध में अन्य विद्वानों के मत इस प्रकार हैं—

1. स्वयंभू (8वीं सदी) ― डॉ. रामकुमार वर्मा।

2. सरहपा (769 ई.) ― राहुल सांकृत्यायन व डॉ. नगेन्द्र

3. पुष्य या पुण्ड (613 ई./सं. 670) ― शिवसिंह सेंगर

4. राजा मुंज (993 ई/ सं. 1050)- चंद्रधर शर्मा गुलेरी

5. अब्दुर्रहमान (11वीं सदी) ― डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी

6. शालिभद्र सूरि (1184 ई.) ― डॉ. गणपतिचंद्र गुप्त

7. विद्यापति (15वीं सदी) ― डॉ. बच्चन सिंह

हिंदी का प्रथम ग्रंथ

जैन श्रावक देवसेन कृत ‘श्रावकाचार’ को हिंदी का प्रथम ग्रंथ माना जाता है। इसमें 250 दोहों में श्रावक धर्म (गृहस्थ धर्म) का वर्णन है। इसकी रचना 933 ई. में स्वीकार की जाती है।

आदिकालीन साहित्य की विशेषताएं/प्रवृतियां—

1. वीरता की प्रवृत्ति

2. श्रृंगारिकता

3. युद्धों का सजीव वर्णन

4. आश्रय दाताओं की प्रशंसा

5. राष्ट्रीयता का अभाव

6. वीर एवं श्रृंगार रस की प्रधानता

7. ऐतिहासिक चरित काव्यों की प्रधानता

8. जन जीवन के चित्रण का अभाव

9. प्रकृति का आलंबन रूप

10. डिंगल और पिंगल दो काव्य शैलियां

11. संदिग्ध प्रामाणिकता

12. ‘रासो’ शीर्षक की प्रधानता

13. प्रबंध एवं मुक्तक काव्य रूप

14. छंद वैविध्य

15. भाषा ― अपभ्रंश डिंगल खड़ी बोली तथा मैथिली का प्रयोग

16. विविध अलंकारों का समावेश

अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य

आदिकाल में भाषाई आधार पर मुख्यतः दो प्रकार की रचनाएं प्राप्त होती हैं, जिन्हें अपभ्रंश की और देशभाषा अर्थात बोलचाल की भाषा इन दो भागों में वर्गीकृत किया जाता है। इसी आधार पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आदिकाल का विभाजन किया है।

इसके अंतर्गत केवल 12 ग्रंथों को ही साहित्यिक मानते हुए उसका वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया है―

अपभ्रंश काव्य― विजयपाल रासो, हम्मीर रासो, कीर्तिलता, कीर्तिपताका।

देश भाषा काव्य― खुमानरासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो, जय चंद्रप्रकाश, जय मयंक जस चंद्रिका, परमाल रासो, खुसरो की पहेलियां और विद्यापति पदावली।

उपयुक्त 12 पुस्तकों के आधार पर ही ‘आदिकाल’ का नामकरण ‘वीरगाथा काल’ करते हुए आचार्य शुक्ल लिखते हैं- “इनमें से अंतिम दो तथा बीसलदेव रासो को छोड़कर सब ग्रंथ वीरगाथात्मक ही हैं, अतः ‘आदिकाल’ का नाम ‘वीरगाथा काल’ ही रखा जा सकता है।”

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने अपभ्रंश के लिए ‘प्राकृतभाषा हिंदी’, ‘प्राकृतिक की अंतिम अवस्था’ और ‘पुरानी हिंदी’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है।

आदिकाल Aadikal का सामान्य परिचय

तात्कालिक बोलचाल की भाषा को विद्यापति ने ‘देशभाषा’ कहा है। विद्यापति की प्रेरणा से ही आचार्य शुक्ल ने ‘देशभाषा’ शब्द का प्रयोग किया है।

आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को ‘अनिर्दिष्ट लोक प्रवृत्ति का युग’ की संज्ञा दी है।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल को ‘अत्यधिक विरोधी और व्याघातों’ का युग कहा है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी, गणपतिचंद्र गुप्त इत्यादि प्रबुद्ध विद्वान स्वीकार करते हैं कि अपभ्रंश और हिंदी के मध्य निर्णायक रेखा खींचना अत्यंत दुष्कर कार्य है अतः हिंदी साहित्य की शुरुआत भक्तिकाल से ही माननी चाहिए।

आदिकाल से संबंधित विभिन्न विद्वानों के प्रमुख कथन

“जब तक भाषा बोलचाल में थी तब तक वह भाषा या देशभाषा ही कहलाती रही, जब वह भी साहित्य की भाषा हो गयी तब उसके लिये ‘अपभ्रंश’ शब्द का व्यवहार होने लगा।”― आ. शुक्ल।

“अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है, जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि.सं. 650 के पहले) को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है।”― आ. शुक्ल।

“अपभ्रंश की पुस्तकों में कई तो जैनों के धर्म-तत्त्व निरूपण ग्रंथ हैं जो साहित्य की कोटि में नहीं आतीं और जिनका उल्लेख केवल यह दिखाने के लिये ही किया गया है कि अपभ्रंश भाषा का व्यवहार कब से हो रहा था। “― आ. शुक्ल।

“उनकी रचनाएँ (सिद्धों व नाथों की) तांत्रिक विधान, योगसाधना, आत्मनिग्रह, श्वास-निरोध, भीतरी चक्रों और नाड़ियों की स्थिति, अंतर्मुख साधना के महत्त्व इत्यादि की सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों और दशाओं से उनका कोई संबंध नहीं। अतः वे शुद्ध साहित्य के अंतर्गत नहीं आतीं। उनको उसी रूप में ग्रहण करना चाहिये जिस रूप में ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ग्रंथ “― आ. शुक्ल।

आदिकाल से संबंधित विभिन्न विद्वानों के प्रमुख कथन

सिद्धों व नाथों की रचनाओं का वर्णन दो कारणों से किया है- भाषा और सांप्रदायिक प्रवृत्ति और उसके संस्कार की परंपरा। “कबीर आदि संतों को नाथपंथियों से जिस प्रकार ‘साखी’ और ‘बानी’ शब्द मिले उसी प्रकार ‘साखी’ और ‘बानी’ के लिये बहुत कुछ सामग्री और ‘सधुक्कड़ी’ भाषा भी।”― आ. शुक्ल।

“चरित्रकाव्य या आख्यान काव्य के लिये अधिकतर चौपाई, दोहे की पद्धति ग्रहण की गई है।… चौपाई-दोहे की यह परंपरा हम आगे चलकर सूफियों की प्रेम कहानियों में तुलसी के ‘रामचरितमानस’ में तथा ‘छत्रप्रकाश’, ‘ब्रजविलास’, सबलसिंह चौहान के ‘महाभारत’ इत्यादि अनेक अख्यान काव्यों में पाते हैं।”― आ. शुक्ल।

“इसी से सिद्धों ने ‘महासुखवाद’ का प्रवर्तन किया। ‘महासुह’ (महासुख) वह दशा बताई गई जिसमें साधक शून्य में इस प्रकार विलीन हो जाता है जिस प्रकार नमक पानी में। इस दशा का प्रतीक खड़ा करने के लिये ‘युगनद्ध’ (स्त्री-पुरुष का आलिंगनबद्ध जोड़ा) की भावना की गई।”― आ. शुक्ल।

आदिकाल से संबंधित विभिन्न विद्वानों के प्रमुख कथन

“प्रज्ञा और उपाय के योग से महासुख दशा की प्राप्ति मानी गई। इसे आनंद-स्वरूप ईश्वरत्व ही समझिये। निर्माण के तीन अवयव ठहराए गए- शून्य, विज्ञान और महासुख।… निर्वाण के सुख का स्वरूप ही सहवाससुख के समान बताया गया।”― आ. शुक्ल।

‘अपने मत का संस्कार जनता पर डालने के लिये वे (सिद्ध) संस्कृत रचनाओं के अतिरिक्त अपनी बानी (रचनाएँ) अपभ्रंश मिश्रित देशभाग में भी बराबर सुनाते रहे।’― आ. शुक्ल।

“सिद्ध सरहपा की उपदेश की भाषा तो पुरानी टकसाली हिंदी हैं, पर गीत की भाषा पुरानी बिहारी या पूरबी बोली मिली है। कबीर की ‘साखी’ की भाषा तो खड़ी बोली राजस्थानी मिश्रित सामान्य भाषा ‘सधुक्कड़ी’ है, पर रमैनी के पदों में काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कहीं पूरबी बोली भी है।” ― आ. शुक्ल।

सिद्धों ने ‘संधा’ भाषा-शैली का प्रयोग किया है। यह अंत:साधनात्मक अनुभूतियों का संकेत करने वाली प्रतीकात्मक भाषा शैली है।― आ. शुक्ल।

“गोररखनाथ का नाथपंथ बौद्धों की वज्रयान शाखा से ही निकला है। नाथों ने वज्रयानी सिद्धों के विरुद्ध मद्य, माँस व मैथुन के त्याग पर बल देते हुए ब्रह्मचर्य पर जोर दिया। साथ ही शारीरिक-मानसिक शुचिता अपनाने का संदेश दिया।”― आ. शुक्ल।

आदिकाल का सामान्य परिचय

“सब बातों पर विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिद्धों से अपनी परंपरा अलग की और पंजाब की ओर चले गए। वहाँ काँगड़े की पहाड़ियों तथा स्थानों में रमते रहे। पंजाब का जलंधर शहर उन्हीं का स्मारक जान पड़ता है।”― आ. शुक्ल।

“राजा भोज की सभा में खड़े होकर राजा की दानशीलता का लंबा-चौड़ा वर्णन करके लाखों रुपये पाने वाले कवियों का समय बीत चुका था। राजदरबारों में शास्त्रार्थों की वह धूम नहीं रह गई थी। पांडित्य के चमत्कार पर पुरस्कार का विधान भी ढीला पड़ गया था। उस समय तो जो भाट या चारण किसी राजा के पराक्रम, विजय, शत्रुकन्या-हरण आदि का अत्युक्तिपूर्ण आलाप करता या रणक्षेत्रों में जाकर वीरों के हृदय में उत्साह की उमंगें भरा करता था, वही सम्मान पाता था।”― आ. शुक्ल।

“उस समय जैसे ‘गाथा’ कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही ‘दोहा’ या ‘दूहा’ कहने से अपभ्रंश का पद्य समझा जाता था।”―आ. शुक्ल।

“दोहा या दूहा अपभ्रंश का अपना छंद है। उसी प्रकार जिस प्रकार गाथा प्राकृत का अपना छंद है।”― हजारीप्रसाद द्विवेदी

आदिकाल का सामान्य परिचय

“इस प्रकार दसवीं से चौदहवीं शताब्दी का काल, जिसे हिंदी का आदिकाल कहते हैं, भाषा की दृष्टि से अपभ्रंश का ही बढ़ाव है।”― हजारीप्रसाद द्विवेदी (‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’)

“डिंगल कवियों की वीर-गाथाएँ, निर्गुणिया संतों की वाणियाँ, कृष्ण भक्त या रागानुगा भक्तिमार्ग के साधकों के पद, राम-भक्त या वैधी भक्तिमार्ग के उपासकों की कविताएँ, सूफी साधना से पुष्ट मुसलमान कवियों के तथा ऐतिहासिक हिंदी कवियों के रोमांस और रीति काव्य- ये छहों धाराएँ अपभ्रंश कविता का स्वाभाविक विकास है।”― हजारीप्रसाद द्विवेदी

रीतिकाल की पूरी जानकारी

रीतिकाल के ध्वनि ग्रंथ

नायक-नायिका भेद संबंधी रीतिकालीन काव्य-ग्रंथ

रीतिकालीन छंदशास्त्र संबंधी ग्रंथ

पर्यायवाची शब्द (महा भण्डार)

रीतिकाल के राष्ट्रकवि भूषण का जीवन परिचय एवं साहित्य परिचय

अरस्तु और अनुकरण

कल्पना अर्थ एवं स्वरूप

राघवयादवीयम् ग्रन्थ

भाषायी दक्षता

हालावाद विशेष

संस्मरण और रेखाचित्र

कामायनी के विषय में कथन

कामायनी महाकाव्य की जानकारी

फरवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of February

फरवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of February

फरवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of February | january to december important days | जनवरी से दिसंबर तक के महत्वपूर्ण दिवस


February के तीसरे शनिवार- विश्व पैंगोलिन दिवस 2020 (World Pangolin Day 2020)

February के दूसरे सप्ताह के दूसरे दिन – सुरक्षित इंटरनेट दिवस (Secure Internet Day)

फरवरी माह के महत्त्वपूर्ण दिवस Important Days of February
फरवरी माह के महत्त्वपूर्ण दिवस Important Days of February

2 फरवरी-

विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day)

नरेगा दिवस (NREGA Day)

4 फरवरी-

विश्व कैंसर दिवस (World Cancer Day)

श्रीलंका का स्वतंत्रता दिवस (National Day of Sri Lanka)

6 फरवरी-

महिला जननांग विकृति के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय शून्य असहिष्णुता दिवस (International Day of Zero Tolerance for Female Genital Mutilation)

10 फरवरी-

राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस (National Deworming Day) (वर्ष में दो बार – 10 फरवरी व 10 अगस्त को)

विश्व दाल दिवस (World Pulses Day)

11 फरवरी-

इंटरनैशनल डे आफ वोमेन एंड गर्ल्स इन सांइस (International Day of Women and Girls in Science)

पं. दीनदयाल उपाध्याय स्मृति दिवस (Pt. Deendayal Upadhyay Memorial Day)

महर्षि दयानन्द सरस्वती जन्मदिवस (Maharishi Dayanand Saraswati Birth Anniversary)

12 फरवरी-

राष्ट्रीय उत्पादकता दिवस (National Productivity Day)

अंतरराष्ट्रीय डार्विन दिवस (International Darwin Day)

13 फरवरी-

राष्ट्रीय महिला दिवस (सरोजिनी नायडू जयंती)

विश्व रेडियो दिवस (World Radio Day)

14 फरवरी-

वेलेनटाइन डे (Valentine’s Day)

18 फरवरी-

रामकृष्ण परमहंस जयंती (Ramakrishna Paramhans Birth Anniversary)

17 फरवरी –

नीरोगी राजस्थान दिवस (Nirog Rajasthan Diwas)

19 फरवरी-

छत्रपति शिवाजी जयंती (Chhatrapati Shivaji Birth Anniversary)

20 फरवरी-

विश्व सामाजिक न्याय दिवस (World Day of Social Justice)

अरुणाचल प्रदेश का स्टेटहुड दिवस (Statehood Day of Arunachal Pradesh)

21 फरवरी-

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस (International Mother Language day)

22 फरवरी-

विश्व चिंतन दिवस (World Thinking Day)

24 फरवरी-

केन्द्रीय उत्पाद शुल्क दिवस (Central Excise Day)

27 फरवरी-

राष्ट्रीय प्रोटीन दिवस (National Protein Day) (2020 में पहला प्रोटीन दिवस मनाया गया)

27 February National Protien Day
27 February National Protien Day

चन्द्रशेखर आजाद शहीद दिवस (Chandrashekhar Azad Martyr’s Day)

विश्व एनजीओ दिवस (World NGO Day)

अंतरराष्ट्रीय ध्रुवीय भालू दिवस (International Polar Bear Day)

28 फरवरी-

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस (National Science Day)

28 February National Science Day
28 February National Science Day

राजेन्द्र प्रसाद स्मृति दिवस (Rajendra Prasad Memorial Day)

28/29 फरवरी-

दुर्लभ बीमारी दिवस (Rare Disease Day)

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जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January

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मार्च के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of March

अप्रैल के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of April

मई माह के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of May

जून के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of June

जुलाई के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of July

अगस्त के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of August

सितम्बर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of September

अक्टूबर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of October

नवम्बर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of November

दिसम्बर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of December

जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January

जनवरी माह के महत्त्वपूर्ण दिवस Important Days of January

Important Days of January – जनवरी माह के महत्त्वपूर्ण दिवस | संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह एवं सप्ताह तथा पूरे वर्ष के दिवस


जनवरी का अंतिम रविवार विश्व कुष्ठ उन्मूलन (World Leprosy Eradication Day)


1 जनवरी-

वैश्विक परिवार दिवस (Global Family Day)

4 जनवरी-

विश्व ब्रेल दिवस (World Braille Day)

8 जनवरी-

अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस स्थापना दिवस (African National Congress Foundation Day)

9 जनवरी-

प्रवासी भारतीय दिवस (NRI – Non-Resident Indian Day OR Pravasi Bharatiya Divas)

10 जनवरी-

विश्व हिन्दी दिवस (World Hindi Day)

विश्व हास्य दिवस (World Comedy Day)

Hindi diwas जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह | Important Days
10 January World Hindi Day

11 जनवरी-

लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि (Lal Bahadur Shastri’s Death Anniversary)

11 January Lal Bahadur Shastri Death Anniversary जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह | Important Days
11 January Lal Bahadur Shastri Death Anniversary

12 जनवरी- राष्ट्रीय युवा दिवस-

स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस (National Youth Day – Birth Anniversary of Swami Vivekananda)

जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January

12 January Swami Vivekanand Birth Day जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह | Important Days
12 January Swami Vivekanand Birth Day

15 जनवरी-

थल सेना दिवस (भारत) (National Army Day)

15 January National Army Day जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह | Important Days
15 January National Army Day

23 जनवरी-

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जयंती (Subhash Chandra Bose Jayanti) (2021 से पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाता है)

23 January Subhsh Chander Bose Birth Day जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह | Important Days
23 January Subhsh Chander Bose Birth Day

24 जनवरी-

राष्ट्रीय बालिका दिवस (National Girl Child Day)

25 जनवरी-

भारत पर्यटन दिवस (National Tourism Day)

राष्ट्रीय मतदाता दिवस (National Voters Day)

हिमाचल प्रदेश दिवस (Himachal Pradesh Day)

26 जनवरी-

भारत का गणतंत्र दिवस (Republic Day of India)

अंतर्राष्ट्रीय सीमा शुल्क दिवस (International Customs Day)

26 January Republic Day Of India जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January संपूर्ण वर्ष के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दिवस एवं सप्ताह | Important Days
26 january

27 जनवरी-

विध्वंस के शिकार लोगों की स्मृति में संयुक्त राष्ट्र दिवस (United Nations Day in Memory of Victims of Demolition)

28 जनवरी-

लाला लाजपत राय जयंती (Birth Anniversary of Lala Lajpat Rai)

30 जनवरी-

महात्मा गांधी की पुण्यतिथि (शहीद दिवस) (Martyrs Day OR Shaheed Divas)

ये भी जानिए-

जनवरी के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of January

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मार्च के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of March

अप्रैल के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of April

मई माह के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of May

जून के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of June

जुलाई के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of July

अगस्त के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of August

सितम्बर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of September

अक्टूबर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of October

नवम्बर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of November

दिसम्बर के महत्त्वपूर्ण दिवस | Important Days of December

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