अभिक्रमित अनुदेशन हिन्दी शिक्षण विधियाँ Hindi Shikshan Vidhiya

अभिक्रमित अनुदेशन हिन्दी शिक्षण विधियाँ Hindi Shikshan Vidhiya

अभिक्रमित अनुदेशन हिन्दी शिक्षण विधियाँ Hindi Shikshan Vidhiya | परिभाषाएं, सिद्धांत/नियम, विशेषताएं प्रकार | Abhikramit Anudeshan

प्रस्तावना

अभिक्रमित अनुदेशन अधिगम के क्षेत्र में प्रस्तुत की जाने वाली एक आधुनिक विधि है।

इस विधि के द्वारा शिक्षार्थियों को अपनी वैयक्तिक भित्रताओं के अनुसार सीखने का अवसर प्राप्त होता है।

इस विधि पर आधारित पाठ्यवस्तु को उसके तत्वों में विभक्त करके, छोटे-छोटे पदो के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सीखने वाला इनकी सहायता से अपनी योग्यता एवं क्षमता के अनुसार तीव्र अथवा सामान्य गति से सीखता है।

पदों का अध्ययन करके शिक्षार्थियों को अपेक्षित अनुक्रियाएं करनी होती है।

इन अनुक्रियाओं की जाँच भी शिक्षार्थी को ही करनी होती है। सीखने वाला अपनी उपलब्धि का मूल्यांकन साथ-साथ करता चलता है। इस प्रकार के अध्ययन में शिक्षार्थी निरन्तर तत्पर बना रहता है तथा उसे अपने ज्ञान प्राप्ति का समुचित बोध भी होता है। यह विधि शिक्षार्थियों को नवीन ज्ञान प्रदान करने, अधिगम की दिशा में तत्पर बनाये रखने तथा उन्हें उद्दीपन प्रदान करने में सहायक है।

अभिक्रमित अनुदेशन हिन्दी शिक्षण-विधियाँ
अभिक्रमित अनुदेशन हिन्दी शिक्षण-विधियाँ

प्रस्तावना

इस प्रकार, यह सीखने की एक ऐसी मनोवैज्ञानिक विधि है, जिसमें शिक्षार्थी को स्वयं ही सीखने का अवसर प्राप्त होता रहता है।

आज की इस अभिक्रमित अनुदेशन विधि के जनक अमेरिका के मनोवैज्ञानिक बीएफ स्किनर है।

स्किनर ने सीखने की प्रक्रिया का सूक्ष्मता से अध्ययन किया और प्रयोगों द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रयत्न तथा सफलता प्राप्त करने से सीखने वाले को प्रोत्साहन मिलता है और वह सीखने में बराबर रुचि लेता है। स्किनर ने पुनर्बलन का सिद्धांत एवं क्रिया प्रसूत अनुकूलन इन दो सिद्धांतों के आधार पर सन 1956 में अभिक्रमित अनुदेशन की विधि का निर्माण किया। शिक्षा जगत में स्किनर ने प्रथमतः अभिक्रमित अनुदेशन शब्द का प्रयोग किया। प्रो. बी एफ स्किनर, नॉर्मन ए क्राउडर, थॉमस एफ गिलबर्ट, सिडनी एल. प्रेसे आदि को इस विधि के प्रतिपादन का श्रेय जाता है।

परिभाषाएँ

बीएफ स्किनर- “अभिक्रमित अध्ययन यह अधिगम शिक्षण की कला तथा विज्ञान है।”

एस्पिच एवं विलियम्स- “अभिक्रमित अनुदेशन से अभिप्राय अनुभवों के उस नियोजित रेखीय क्रम से है, जो उद्दीपक अनुप्रिया संबंध के संदर्भ में प्रभावशाली माने जाने वाली दक्षता की ओर अग्रसर करती है।”

सुमित एवं मोरे- “अभिक्रमित अनुदेशन किसी अधिगम सामग्री को क्रमिक पदों की श्रृंखला में व्यवस्थित करने वाली प्रक्रिया है और प्रायः इसके द्वारा किसी विद्यार्थी को उसकी परिचित पृष्ठभूमि से संप्रत्ययों, प्रनियमों और बोध के एक जटिल और नवीन स्तर पर लाया जाता है।”

एन एस मावी- “अभिक्रमित अनुदेशन अनुदेशनात्मक क्रिया को अनुदेशन एवं स्व अधिगम में परिवर्तित करने की तकनीक है। इसमें विषय वस्तु को छोटी-छोटी श्रृंखलाओं में विभाजित किया जाता है। अधिगमकर्ता उन्हें पढ़कर सही या गलत अनुक्रिया करता है। गलत अनुक्रिया को ठीक करता है, सही अनुक्रियाओं की पुष्टि करता है। वह सूक्ष्म रेखिय में पारंगत होने का प्रयास करता है।”

डी एल कुक- “अभिक्रमित अधिगम एक शब्द है जो स्वचालित आत्म-निर्देशित विधि के पर्याय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।”

अभिक्रमित अनुदेशन के सिद्धांत/नियम

अभिक्रमित अनुदेशन स्वयं एक शैक्षिक नवाचार है। इसमें शिक्षा तथा शिक्षा मनोविज्ञान के अनेक सिद्धांत निहित हैं, जो इस प्रकार से है-

1. क्रमिक लघु पदों का नियम-

अभिक्रमित अनुदेशन में सिखाई जाने वाली सामग्री को तार्किक क्रम में छाटे-छोटे फ्रेम में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि पहला फ्रेम आगे आने वाले फ्रेम का आधार होता है। विषय वस्तु के इस छोटे पद या अंश को फ्रेम कहा जाता है यह पद एक दूसरे के साथ रेखे रूप में जुड़े रहते हैं। इसमें शिक्षार्थी प्रत्येक फ्रेम को आसानी से समझ कर समग्र ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

2. सक्रिय प्रतिभागिता का नियम

विषय वस्तु के साथ बालक जब सक्रिय प्रतिभागिता करता है तब वह सरलता से सीखता है, अतः सक्रिय प्रतिभागिता से अभिप्राय बालक द्वारा पाठ्यवस्तु का तत्परता के साथ अध्ययन किया जाता है। इसके अनुसार सीखने की आवश्यक शर्त सक्रियता है।

3. प्रतिपुष्टि का सिद्धांत

यह सिद्धांत उत्तर की तुरंत जांच पर आधारित है शिक्षार्थी अभिक्रमित अध्ययन सामग्री में उपलब्ध सही उत्तर को देखकर अपने उत्तर की पुष्टि कर सकता है इससे उसे आंतरिक संतुष्टि एवं बल प्राप्त होता है जिससे सीखने की गति बढ़ जाती है सीखने के तुरंत बाद सीखने का मूल्यांकन और प्रश्न का उत्तर ठीक देने पर उसकी पुष्टि और इससे आगे बढ़ने की प्रेरणा को प्रतिपुष्टि का सिद्धांत कहते हैं।

4. स्वयं गति का सिद्धांत

इस सिद्धांत में व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखा जाता है।

इसे बालक अपनी गति बुद्धि क्षमता योग्यता अभिवृत्ति आदि के अनुसार सीखता है इसे ही शक्ति का सिद्धांत कहते हैं

सोया परीक्षण का सिद्धांत इस सिद्धांत के अनुसार सीखने वाला स्वयं अपना परीक्षण कर सकता है और वह यह भी जान सकता है कि उसने कितना सीखा है और कितना सीखना शेष है इसके माध्यम से अध्यापक शिक्षार्थियों की कमजोरियों को जानकर अपने अभिक्रमित अधिगम को सुधार सकता है इसे स्वयं परीक्षण का सिद्धांत कहा जाता है।

5. स्व परीक्षण का सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार सीखने वाला स्वयं अपना परीक्षण कर सकता है और वह यह भी जान सकता है कि उसने कितना सीखा है और कितना सीखना शेष है।

इसके माध्यम से विद्यार्थी अपनी कमजोरियों को जानकर अपने अभिक्रमित अधिगम को सुधार सकता है।

इसे स्वर परीक्षण का सिद्धांत कहा जाता है।

अभिक्रमित अनुदेशन की विशेषताएं : अभिक्रमित अनुदेशन हिन्दी शिक्षण विधियाँ Hindi Shikshan Vidhiya

1. अभिक्रमित अनुदेशन में पाठ्य-सामग्री को छोटे-छोटे अंशों में विभाजित कर पढ़ाया जाता है।
2. ये छोटे-छोटे अंश परस्पर रेखीयबद्ध होते है।
3. अभिक्रमित निर्देशन में प्रत्येक पद अपने आगे वाले पद से तार्किक रूप से जुड़ा होता है।
4. सीखने वाले को सतत प्रयास करना पड़ता है।
5. शिक्षार्थियों के पूर्व व्यवहार अथवा पूर्व ज्ञान का विशेष ध्यान रखा जाता है।
6. अनुदेशन के उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखा जाता है।
7. शिक्षा पाठय-सामग्री का स्वयं अध्ययन करता है। साथ-साथ वह अनुक्रिया भी करता है।
8. शिक्षार्थी के व्यवहार को समुचित पृष्ठपोषण (Feedback) प्रदान किया जाता है।

विशेषताएं

9. शिक्षार्थी की प्रत्येक अभिक्रिया उसे एक नया ज्ञान प्रदान करती है।
10. शिक्षार्थियों की अनुक्रियाओं के आधार पर स्व-मूल्यांकन किया जाता है और तदनुसार उसमें सुधार तथा परिवर्तन भी किया जाता है।
11. अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षार्थियों की कठिनाइयों और कमजोरियों का निदान कर उपचारात्मक अनुदेशन की भी व्यवस्था करता है।
12. अध्यापक की उपस्थिति के बिना शिक्षार्थी सुगमता से अधिगम प्राप्त कर लेता है।
13. अभिक्रमित अनुदेशन में पुनर्बलन के सिद्धांतों की पुष्टि होती है।
14. अभिक्रमित अनुदेशन प्रणाली मनोवैज्ञानिक अधिगम सिद्धांतों पर आधारित है।
15. अभिक्रमित-अनुदेशन द्वारा परंपरागत शिक्षा की अपेक्षा शिक्षार्थी अधिक सीखता है।

अभिक्रमित अनुदेशन के प्रकार

अभिक्रमित अनुदेशन एक संपूर्ण शैक्षिक कार्यक्रम है।

इसकी रचना के आधार पर अभिक्रमित अनुदेशन का वर्गीकरण निम्नानुसार किया जा सकता है-
1. रेखीय अभिक्रमित
2. शाखीय अभिक्रम
3. मेथेटिक्स अभिक्रम

अभिक्रमित अनुदेशन के दोष अथवा सीमाएं

अभिक्रमित अनुदेशन में केवल पढ़ने और बोध शक्ति के विकास को ही अवसर मिलता है

भाषा शिक्षण के अन्य कौशल जैसे- सुनना, बोलना, लिखना, चिंतन मनन शक्ति आदि के विकास संबंधी पक्ष उपेक्षित रह जातें हैं

जो विद्यार्थी लापरवाह प्रवृत्ति के होते हैं यदि उन पर अध्यापक बराबर नियंत्रण न हो तो वे और भी लापरवाह हो जाते हैं

धीरे-धीरे शिक्षा में उनकी अरुचि हो जाती है

यह तकनीकी अनुदेशात्मक उद्देश्यों में से ज्ञानात्मक उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायक हो सकती है

अभिक्रमित अनुदेशन का प्रयोग हर विषय के लिए किया जाना असंभव है
क्योंकि सभी विषयों व उनसे संबंधित प्रकरणों का अभिक्रम का निर्माण किया जाना मुश्किल है

अभिक्रमित अनुदेशन के दोष अथवा सीमाएं

कंप्यूटर मशीन द्वारा शिक्षण होने से कक्षा में जो एक भावनात्मक वातावरण बनता है उसका अभाव होता है
शिक्षा अपने व्यक्तित्व से होने अनेक बातों के लिए छात्रों को प्रभावित करता है इसमें प्रभाव का अभाव रहता है

अभिक्रमित अनुदेशन को व्यक्तिक अनुदेशन की एक तकनीकी माना गया है
परंतु वास्तव में यह बात ठीक नहीं हर छात्र को अधिगम में अपनी अपनी गति से तो आगे बढ़ना होता है
परंतु अधिगम की सामग्री तो हर छात्र के लिए एक सी ही होती है
सभी छात्रों को एक से तरीके से सिखाना होता है और अधिगम अनुदेशन में बताए हुए एक से रास्ते से ही आगे बढ़ना होता है

अभिक्रमित अनुदेशन, अनुदेशन प्रक्रिया की स्वाभाविकता को समाप्त कर उसे यांत्रिक प्रक्रिया बना देती है
विद्यार्थी, विद्यार्थी न रहकर मशीन के पुर्जे बन जाते हैं

स्रोत NCERT शिक्षा में सूचना एवं संचार तकनीकी

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