भारत का स्वर्णिम अतीत : तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय

भारत का स्वर्णिम अतीत : तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय

इन्क्रेडिबल इंडिया: सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय जैसी सांस्कृतिक विरासत का महत्त्व एवं ऐतिहासिक योगदान के बारे में जानकारी

असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतं गमय।।

बृहदारण्यकोपनिषद् का उक्त वाक्य भारतीय ज्ञान और ज्ञान प्राप्ति की तीव्र उत्कंठा को दर्शाता है।

विश्व के ज्ञात इतिहास को परखे तो पता चलता है कि विश्व में केवल भारत ही वह पुण्य भूमि है जहां ज्ञान की उत्पत्ति हुई और ज्ञान को सर्वोपरि महत्त्व दिया गया प्राचीन भारत में अनेक विश्वविद्यालय थे,

जो ज्ञान का केंद्र बिंदु थे अनेक ज्ञात विश्वविद्यालयों की सूची में तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय का नाम एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में जुड़ चुका है।

तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय की उपस्थिति भारत को जगद्गुरु और ज्ञान का केंद्र बिंदु सिद्ध करने में एक और अध्याय जोड़ता है।

इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेषों से यह सिद्ध हो जाता है कि प्राचीन भारत में शिक्षा की एक सुदीर्घ और सुव्यवस्थित प्रणाली विकसित हो चुकी थी, जिसकी कीर्ति भारत ही नहीं वरन् उसके बाहर भी दूर-दूर तक थी।

यह विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से लगभग 300 से 400 वर्ष प्राचीन है

जिसके अवशेष 2014 में बिहार के नालंदा जिले में एकंगरसराय उपखण्ड के तेल्हाड़ा ग्राम में उत्खनन के दौरान प्राप्त हुए हैं।

तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय सांस्कृतिक विरासत इन्क्रेडिबल इंडिया
तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय सांस्कृतिक विरासत इन्क्रेडिबल इंडिया

काल निर्धारण : तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय सांस्कृतिक विरासत इन्क्रेडिबल इंडिया

बिहार पुरातत्व विभाग के अनुसार इस स्थल की सर्वप्रथम खोज वर्ष 1872 में एस. ब्रोडले ने की थी।

ब्रोडले ने इस स्थल के लिए तिलास-अकिया शब्द का प्रयोग किया है।

तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से भी अधिक प्राचीन था।

इसकी पुष्टि यहां से प्राप्त तीन प्रकार की ईंटों से भी हो जाती है।

सबसे बड़े आकार की ईंटें कुषाण कालीन है जिनका आकार 42*32*6 सेमी. है, जो इस महाविहार में सबसे नीचे प्राप्त हुई है।

इसके ऊपर गुप्तकालीन ईंटें हैं जिनका आकार 36*28*5 सेमी. है।

इसके ऊपर पालकालीन ईंटों की चिनाई है जिनका आकार 32*28*5 सेमी. है ईंटों के आकार और चिनाई से ज्ञात होता है कि इस महाविहार का जीर्णोद्धार विभिन्न राजवंशों ने करवाया था।

 

कुषाण कालीन इंटों का सबसे नीचे मिलने का अर्थ है महाविहार का प्रारंभिक निर्माण कुषाण शासकों द्वारा करवाया गया था,

जबकि नालंदा विश्वविद्यालय गुप्तकालीन (चौथी शताब्दी ईस्वी) है और विक्रमशिला विश्वविद्यालय (सातवीं शताब्दी ईस्वी) पाल शासकों की देन है,

अतः कालक्रम की दृष्टि से देखें तो तेल्हाड़ा महाविहार (विश्वविद्यालय) नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय से प्राचीन सिद्ध होता है।

उत्खनन में प्राप्त सामग्री : तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय सांस्कृतिक विरासत इन्क्रेडिबल इंडिया

उत्खनन में महाविहार के भग्नावशेषों के साथ-साथ अनेक सील और सीलिंग (मुहरें) घंटियां, कांस्य प्रतिमाएँ, आंगन, बरामदा, साधना कक्ष, कुएं और नाले के साक्ष्य मिले हैं।

तप में लीन बुद्ध की अस्थिकाय दुर्लभ मूर्ति भी प्राप्त हुयी है जो एक सील (मुहर) पर उत्कीर्ण है।

यहां से प्राप्त अधिकतर सीलें (मुहरें) टेराकोटा (एक विशेष प्रकार की मिट्टी) की बनी हुई हैं।

उत्खनन में प्राप्त एक मोहर पर पालि में लिखे लेख को पढ़ने में कोलकाता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. एस. सान्याल ने सफलता प्राप्त की है।

उनके अनुसार मुहर पर उत्कीर्ण लेख में वर्णित जानकारी के अनुसार इस महाविहार का वास्तविक नाम तिलाधक, तेलाधक्य या तेल्हाड़ा नहीं वरन श्री प्रथम शिवपुर महाविहार है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग ने भी अपने वृतांतों में इस महाविहार का उल्लेख किया है।

ह्वेनसांग और इत्सिंग ने इसका उल्लेख तीलाधक नाम से किया है।

ह्वेनसांग और इत्सिंग के अनुसार यह महाविहार अपने समय का उच्च कोटि का सुंदर, विशिष्ट और श्रेष्ठ महाविहार था।

महाविहार में तीन मंजिला मंडप के साथ-साथ तीन मंदिर, अनेक तोरणद्वार, मीनार और घंटिया होती थीं।

चीनी यात्रियों के कथन की पुष्टि उत्खनन में प्राप्त अवशेषों से होती है।

चरमोत्कर्ष एवं पतन : तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय सांस्कृतिक विरासत इन्क्रेडिबल इंडिया

प्राचीन भारत ज्ञान विज्ञान अध्यात्म धर्म दर्शन आदि सभी विधाओं में अत्यंत समृद्ध था।

वैदिक वांग्मय उक्त कथन का पुष्ट प्रमाण है।

बौद्धकाल आते-आते भारतीय ज्ञान-विज्ञान की ख्याति सुदूर देशों तक फैल गई, जिसका प्रमाण प्राचीन भारत के शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित महाविहार (विश्वविद्यालय), उन में पढ़ने वाले असंख्य देशी-विदेशी छात्र और शिक्षक हैं।

तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय अपनी स्थापना (प्रथम शताब्दी ईस्वी) के कुछ वर्षों बाद ही प्रसिद्धि को प्राप्त करने लगा था।

ह्वेनसांग के वृतांत के अनुसार सातवीं शताब्दी तक तेल्हाड़ा महाविहार में सात मठ तथा शिक्षकों के लिए अलग-अलग कक्ष थे।

इस महाविहार में लगभग 1000 बौद्ध भिक्षु महायान संप्रदाय की शिक्षा ग्रहण करते थे।

ह्वेनसांग और इत्सिंग के वृत्तांतों से सिद्ध होता है कि यह महाविहार बौद्ध शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र था

जो कि मुख्यतः बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा को समर्पित था।

11 वीं शताब्दी ईस्वी तक तेल्हाड़ा महाविहार की प्रसिद्धि चरमोत्कर्ष पर थी।

 

कभी-कभी किसी स्थान की समृद्धि ही उसके पतन का कारण बन जाती है।

ऐसा ही भारत और उसके ज्ञान विज्ञान के साथ हुआ है।

मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण सातवीं शताब्दी से ही शुरू हो गए थे परंतु 10 वीं शताब्दी तक भारतीय शासकों ने उनसे कड़ा संघर्ष किया 11वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतीय शक्ति क्षीण होने लगी इस्लामी के आक्रांताओं ने साम-दाम-दंड-भेद की नीति का अनुसरण किया और एक के बाद एक प्रदेशों को जीते चले गये।

तेल्हाड़ा के उत्खनन में महाविहार की दीवारों पर अग्नि के साक्ष्य और राख की एक फुट मोटी परत मिली है।

इसी के आधार पर विशेषज्ञों का मानना है कि-

1192 में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने ओदंतपुरी की विजय के दौरान मनेर से दक्षिण की ओर तेल्हाड़ा की ओर प्रस्थान किया था।

उसने नालंदा विहार की तरह यहां भी बहुत आतंक मचाया और यहां के शिक्षकों और शिक्षार्थियों का वध कर महाविहार में आग लगा दी जिसके कारण इसका पतन हो गया।

विशेषज्ञों का मत –

बिहार के कला संस्कृति और युवा विभाग के सचिव आनंद किशोर का दावा है, ”तेल्हाड़ा में 100 से ज्यादा ऐसी चीजें मिली हैं, जो साबित करती हैं कि तेल्हाड़ा में प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष हैं. यहां कुषाणकालीन ईंट और मुहरें मिली हैं, जिनके पहली शताब्दी में बने होने का प्रमाण मिलता है. ध्यान देने वाली बात है कि नालंदा को चौथी और विक्रमशिला को आठवीं शताब्दी का विश्वविद्यालय माना जाता है।”

बिहार पुरातत्व विभाग के निदेशक डॉ. अतुल कुमार वर्मा की माने तो संभवतः तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय बिहार का प्रथम विश्वविद्यालय था।

प्राचीन भारत के अन्य विश्वविद्यालयों की तरह तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय कि सभी व्यवस्थाएं भी शासकों द्वारा प्राप्त दान अथवा उनके द्वारा दान में दिए ग्रामों से प्राप्त आय के द्वारा ही होती थी।

विद्यार्थियों की शिक्षा, आवास, भोजन, चिकित्सा इत्यादि सभी नि:शुल्क थे।

बिहार विरासत समिति के सचिव डॉ. विजय कुमार चौधरी कहते हैं, ”बिहार में ऐसे पुरातात्विक साक्ष्य भरे पड़े हैं. राज्य में पुरातात्विक स्थलों के सर्वेक्षण में 6,500 साइटें मिली हैं.

उनमें कई महत्वपूर्ण महाविहार हैं. तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय का अवशेष उसी कड़ी का हिस्सा है।

भविष्य की योजना-

तेल्हाड़ा को विश्व पटल पर लाने के लिए बिहार सरकार ने 28 करोड़ की लागत से तेल्हाड़ा मैं एक म्यूजियम की योजना तैयार की है।

म्यूजियम के साथ-साथ तेल्हारा विद्यालय के लिए एक मास्टर प्लान भी तैयार करने की योजना है

जिसमें तेल्हाड़ा की खुदाई के साथ ही उसे यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल कराने के लिए आवश्यक प्रपत्र तैयार करने से संबंधित विषय भी शामिल किये जाएंगे।

इन्क्रेडिबल इंडिया: सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय जैसी सांस्कृतिक विरासत का महत्त्व एवं ऐतिहासिक योगदान के बारे में जानकारी

नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ० अरविंद पनगढिय़ा

प्राचीन तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय के खंडहर का अवलोकन कर इसे इन्क्रेडिबल इंडिया – अतुल्य भारत में शामिल करने कि बात की है।

अतः निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत वास्तव में जगद्गुरु था।

भारत ने ही विश्व को ज्ञान की प्रथम किरण दिखाई थी और हमारे पूर्वजों ने ही संपूर्ण विश्व में ज्ञान का प्रकाश फैलाया था।

हमें गर्व है अपने गौरवशाली स्वर्णिम अतीत तेल्हाड़ा विश्वविद्यालय पर।

आइए भारतीय होने पर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करें और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करें।

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