हिन्दी दिवस – 14 सितंबर

हिन्दी दिवस का इतिहास एवं उपलब्धियां

इस आलेख में हम हिन्दी दिवस का इतिहास एवं उपलब्धियां आदि के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करेंगे।

क्यों मनाया जाता है हिन्दी दिवस?

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिट्य न हिय को सूल।

अब जानते हैं हिन्दी दिवस का इतिहास-

इतिहास

1 मई 1910 में नागरी प्रचारिणी सभा काशी के तत्वावधान में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना प्रयाग में हुयी।

हिंदी साहित्य सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि का व्यापक प्रचार प्रसार करना।

हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि का विकास राष्ट्रव्यापी संपर्क भाषा और लिपि के रूप में करना था।

सम्मेलन का अधिवेशन प्रतिवर्ष होता था।

वर्ष 1918 के अधिवेशन में महात्मा गांधी ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में हिंदी को जन भाषा स्वीकार किया।

इसे राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत की तथा कहा कि “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।”

स्वतंत्रता आंदोलन में हिंदी का व्यापक योगदान रहा।

उत्तर से दक्षिण को जोड़ने का काम हिंदी ने किया।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अहिंदी भाषी स्वतंत्रता सेनानियों ने हिंदी सीखी तथा दूसरों को भी हिंदी सीखने के लिए प्रेरित किया।

हिन्दी दिवस - 14 सितंबर
हिन्दी दिवस – 14 सितंबर

स्वतंत्र्योत्तर स्थिति

स्वतंत्रता के पश्चात देश के सामने अनेक कठिनाइयां आयी जिनमें से भाषा और लिपि की भी एक समस्या थी।

14 सितंबर 1949 को गहन विचार-विमर्श एवं वाद-विवाद के बाद यह निर्णय लिया गया कि “संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय रूप होगा।”

उक्त निर्णय को भारत के संविधान के भाग 17 में अनुच्छेद 343 (1) में वर्णित किया गया है।

अन्य सांविधानिक प्रावधान

26 जनवरी 1950 को संविधान के लागू होने के साथ ही उक्त प्रावधान लागू हो गया।

किंतु अनुच्छेद 343 (2) में यह व्यवस्था भी थी कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष की अवधि तक अर्थात् सन् 1965 ईस्वी तक संघ के सभी सरकारी कार्यों के लिए अंग्रेजी का भी प्रयोग होता रहेगा।

वर्ष 1965 में 15 वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद भी अंग्रेजी में कामकाज जारी रहा।

1965 के बाद की स्थिति

26 जनवरी 1965 को भारतीय संसद में एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें यह कहा गया कि-

“हिंदी का सभी कार्यालयों में प्रयोग किया जाएगा लेकिन उसके साथ साथ अंग्रेजी का भी सह राजभाषा के रूप में उपयोग किया जाएगा।”

1967 के ‘भाषा संशोधन विधेयक’ में अंग्रेजी को अनिवार्य किया और हिंदी का कहीं जिक्र तक नहीं किया गया।

राजभाषा की स्थिति पर श्री शंकर दयाल सिंह ने लिखा है कि

“आजादी मिलने के बाद यह नहीं कहा गया कि अभी राष्ट्रध्वज तैयार नहीं है।

इसलिए ‘यूनियन जैक कुछ दिन तक फहराता रहे या अपने राष्ट्रगान का स्वर अभी परिचित नहीं है इसलिए ‘लांग लिव द किंग कुछ दिनों तक चलना चाहिए।

जब ऐसी बातें राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान के संबंध में नहीं हुई तो फिर राष्ट्रभाषा के संबंध में यह पक्षपातपूर्ण नीति क्यों लागू की गयी ?

इससे एक बात तो स्पष्ट दिखती है कि अपने संविधान निर्माताओं और उसे लागू करने वालों की नीयत हिन्दी के संबंध में साफ नहीं थी।

हिन्दी के संबंध में इस आश्वासन और समझौते का औचित्य क्या है ?

कोई भी प्रधानमंत्री संविधान से बड़ा नहीं होता, संविधान के तहत ही होता है ।

जब संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया तब फिर इस आश्वासन की जरूरत क्या है कि जब तक देश के सभी राज्य हिन्दी को न अपनाएँ तब तक वह राजभाषा नहीं होगी या अंग्रेजी इसके साथ-साथ चलेगी।”

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी.एन. शेषन ने संसदीय राजभाषा समिति के पूर्व अध्यक्ष स्व. शंकर दयाल सिंह को लिखे एक पत्र में कहा था

“राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है और राष्ट्रीय एकता के प्रति सभी भारतवासियों को एक सूत्र में बांधने वाली इस भाषा के प्रति हमें जाग्रत चिंतन से कार्य करना चाहिए।”

उपलब्धियां

अब जानते हैं उपलब्धियां-

बांग्ला भाषी केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से गुजराती भाषी दयानंद सरस्वती ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना हिंदी में की, जबकि वे स्वयं संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे।

हिंदी साहित्य के विकास में अहिंदीभाषी क्षेत्र के विद्वानों, कवियों और लेखकों का अविस्मरणीय योगदान रहा है।

तेलुगु वल्लभाचार्य, तमिल रांगेय राघव, गुजराती अमृतलाल नागर, मराठी मुक्तिबोध, पंजाबी मोहन राकेश आदि कुछ उल्लेखनीय नाम है जिन्होंने हिंदी की विशेष सेवा की है, एक सकारात्मक संदेश दिया है।

आज के कंप्यूटर के युग में हिन्दी चहूँ ओर अपने पंख फैला रही है।

इंटरनेट के माध्यम से यह सर्वसुलभ हो रही है। संपूर्ण देश ही नहीं विदेश में भी इसकी पहचान बनी है।

विश्व के सौ से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन अध्यापन किया जा रहा है।

आज सभी विदेशी मोबाइल कंपनियां अपने मोबाइल में हिंदी भाषा अवश्य देती है।

गूगल ने भी हिंदी में अपने एप्लीकेशन तैयार किये है।

गूगल कीबोर्ड से आसानी से हिंदी टाइपिंग की जा सकती है।

ऑनलाइन शॉपिंग एप्लीकेशन ने अब हिंदी में शॉपिंग ऑप्शन देने शुरू कर दिए हैं।

विश्व में बोली जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा हिंदी है।

हिंदी दिवस

हिंदी दुनिया की एकमात्र ऐसी भाषा है जिसकी सुरक्षा एवं देश के प्रति जागरूकता के दिवस मनाए जाने की आवश्यकता अनुभूति रही है।

हिंदीदिवस हिंदी को राजभाषा घोषित करने के साथ ही शुरू नहीं हुआ, बल्कि जब हिंदी प्रेमियों ने यह अनुभव किया कि हिंदी के लिए जो सांविधानिक प्रावधान किए गए हैं, उनको निष्ठापूर्वक लागू नहीं किया जा रहा है।

लोगों को जागरूक करने तथा हिंदी को अपना खोया गौरव लौटाने के लिए प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है चूंकि इसी दिन हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ था अतः इसी दिन हिंदी दिवस मनाया जाता है।

जब तक हिंदी को उसका सही अधिकार नहीं मिल जाता तब तक हिंदी दिवस की आवश्यकता रहेगी।

यह दिवस सत्ता लोलुप नेताओं के गालों पर करारा तमाचा है।

जिसकी गूंज प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हमें सुनाई देती है और हमसे प्रश्न करती है कि क्यों मुझे अपने ही घर में कोई अधिकार नहीं है?

हिंदी को उसका अधिकार और खोया हुआ सम्मान दिलाने के लिए अनेक प्रयास अभी तक हुए हैं लेकिन सत्ता लोलुप नेताओं ने मुट्ठी भर कोटे की मानसिकता के लोगों के साथ मिलकर 120 करोड़ भारतीयों की भावनाओं पर कुठाराघात किया है।

इस आलेख में हम जैसा पहले हिन्दी दिवस का इतिहास एवं उपलब्धियां जान चुके हैं। अब जानते हैं इससे संबंधित कथन-

हिंदी दिवस पर विचाराभिव्यक्ति करते हुए डॉ विनोद अग्निहोत्री लिखते हैं

“आजादी की लड़ाई में हिन्दी भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के खिलाफ स्वाधीनता संघर्ष की भाषा बन गयी थी।

आजादी के बाद हिन्दी भाषी एक ऐसी हीन ग्रंथि का शिकार होते चले गये।

हिन्दी उनके लिए एक ऐसी बूढ़ी मां की तरह है जो अपने ही घर के कोने में पड़ी है।”

डॉ अब्दुल बिस्मिल्लाह का कथन

“एक खास तरह का वर्ग है जो सभी महत्त्वपूर्ण जगहों को अपने हाथ में समेटे हुए हैं।

वह नहीं चाहता कि हिन्दी को सम्मानजनक स्थान मिले। फिर भी हिन्दी का विकास वे रोक नहीं पायेंगे।

हिन्दी का विकास विश्वविद्यालयों से नहीं, जनता के बीच से हो रहा है।

दुनिया में वही भाषा समृद्ध है जिसमें अधिक से अधिक दूसरी भाषाओं के शब्दों को खपा लेने की क्षमता है।

हिन्दी का विकास समितियों या कानून से संभव नहीं है, इसे जनता ही आगे बढ़ाएगी ।

यह सुखद बात है कि अब अहिन्दी प्रदेशों में भी हिन्दी खूब पढ़ी जा रही है।”

आशा है कि आपको यह आलेख हिन्दी दिवस का इतिहास एवं उपलब्धियां आदि के बारे में पूरी जानकारी मिली होगी।

विकिपीडिया लिंक हिन्दी दिवस- https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8

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