भारत का विधि आयोग

भारत का विधि आयोग (Low Commission)

विधि संबंधी विषयों पर महत्त्वपूर्ण परामर्श देने के लिए सरकार आवश्यकतानुसार आयोग नियुक्त करती है; इन्हें विधि आयोग (Law Commission, लॉ कमीशन) कहते हैं। स्वतन्त्र भारत में अब तक 22 विधि आयोग बन चुके हैं। 22वें विधि आयोग के गठन हेतु केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने 19 फरवरी, 2020 को अनुमति प्रदान कर दी है, इस विधि आयोग का कार्याकाल भारत के राजपत्र में गठन के आदेश के प्रकाशन की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के लिये होगा

भारत के विधि आयोग का इतिहास

प्रथम विधि आयोग (First Law Commission)

भारत में प्रथम विधि आयोग का गठन स्वतंत्रता से पूर्व किया गया था

ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन में 1833 का चार्टर एक्ट के अंतर्गत 1834 में ब्रिटिश पार्लियामेंट में मैकाले की सिफारिश पर भारत के पहले विधि आयोग का गठन किया गया था।

विधि एवं सांविधानिक इतिहास में इसका विशेष महत्त्व है।

प्रारंभ में विधि आयोग में चार सदस्य थे- लार्ड मैकाले, कैमरॉन, विलियम एंडरसन तथा मैक लियाड थे।

आयोग में अधिक-से अधिक पाँच सदस्य हो सकते थे। 1837 में मिलेट इसके पाँचवें सदस्य बने थे।

प्रथम विधि आयोग का उद्देश्य थे-

(1) न्यायालय एवं न्यायालयों की कार्यप्रणाली में क्या-क्या सुधार लाया जाए, इस संबंध में सुझाव देना।
(2) न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र एवं शक्तियों की जाँच करना।
(3) भारत में प्रचलित सभी विधियों-दीवानी, फौजदारी, लिखित एवं परंपरागत की जाँच पड़ताल करना।
(4) नियमों, परिनियमों, अधिनियमों आदि में परिवर्तन, परिवर्तन, संशोधन आदि के बारे में सुझाव देना।
(5) पुलिस विभाग की वास्तविक स्थिति की जाँच कर उनमें सुधार के उपाय सुझाना।

प्रथम विधि आयोग ने दंड संहिता आलेख भी (Draft of Indian Penal Code) तैयार किया, भारत का सिविल लॉ उस समय अव्यवस्थित था। उस पर दी गई गई रिपोर्ट, जिसे देशीय विधि (Lex Loci) रिपोर्ट नाम दिया गया, अत्यधिक महत्त्वपूर्ण मानी गयी।

द्वितीय विधि आयोग (Second Law Commission)

भारत के दूसरे विधि आयोग का गठन भी स्वतंत्रता से पूर्व हुआ।

1853 ईस्वी के चार्टर एक्ट के अंतर्गत द्वितीय विधि आयोग की स्थापना 29 नवंबर, 1853 को अंग्रेज न्यायाधीश जॉन रामिली की अध्यक्षता में की गयी। इस विधि आयोग में 8 सदस्य थे, इस आयोग को प्रथम विधि आयोग के द्वारा दिए गए सुझावों की जांच करने का कार्य सौंपा गया इस आयोग ने चार रिपोर्ट प्रस्तुत की जिनके अंतर्गत-

(i) अपनी प्रथम रिपोर्ट में आयोग ने फोर्ट विलियम स्थित सर्वोच्च न्यायालय एवं सदर दीवानी और निजामत अदालतों के एकीकरण का सुझाव दिया।

(ii) प्रक्रियात्मक विधि की संहिताएँ तथा योजनाएँ प्रस्तुत कीं।

(iii) इसी प्रकार पश्चिमोत्तर प्रांतों और मद्रास तथा बंबई प्रांतों के लिए भी तृतीय और चतुर्थ रिपोर्ट में योजनाएँ बनायी गयी फलस्वरूप 1859 ई. में दीवानी व्यवहार संहिता एवं लिमिटेशन एक्ट, 1860 में भारतीय दंडसंहिता एवं 1861 में आपराधिक व्यवहार संहिता बनी।

1861 ई. में ही भारतीय उच्च न्यायालय विधि पारित हुई।

1861 में दीवानी संहिता उच्च न्यायालयों पर लागू कर दी गयी।

अपनी द्वितीय रिपोर्ट में आयोग ने दंड संहिता और दंड प्रक्रिया संहिता को संहिताबद्ध करने की सिफ़ारिश की।यह सुझाव भी दिया कि हिंदुओें और मुसलमानों के वैयक्तिक कानून को स्पर्श करना बुद्धिमत्तापूर्ण न होगा।

इस आयोग का कार्यकाल केवल तीन वर्ष रहा।

तृतीय विधि आयोग (Third Law Commission)

तीसरे भारतीय विधि आयोग का गठन 2 दिसंबर, 1861 ई. में जान रामिली की ही अध्यक्षता में हुआ। और नियुक्ति का आधार द्वितीय विधि आयोग द्वारा तय समय सीमा में अपने कार्य को पूरा न करना माना गया था।
इसके सम्मुख मुख्य समस्या थी मौलिक दीवानी विधि के संग्रह का प्रारूप बनाना। तृतीय विधि आयोग की नियुक्ति भारतीय विधि के संहिताकरण की ओर प्रथम पद था।

आयोग ने कुल सात रिपोर्टें दीं-

प्रथम रिपोर्ट ने आगे चलकर भारतीय दाय विधि 1865 का रूप लिया।

द्वितीय रिपोर्ट में अनुबंध विधि का प्रारूप था।

तृतीय में भारतीय परक्राम्यकरण विधि का प्रारूप।

चतुर्थ में विशिष्ट अनुतोष विधि का प्रारूप।

पंचम में भारतीय साक्ष्य विधि का प्रारूप।

षष्ठ में संपत्ति हस्तांतरण विधि का प्रारूप प्रस्तुत किया गया था।

सप्तम एवं अंतिम रिपोर्ट आपराधिक संहिता के संशोधन के विषय में थी।

आपका मुख्य काम भारत के लिए सैद्धान्तिकी दीवानी विधि को अंग्रेजी विधि के आधार पर तैयार करना था। आयोग के सुझावों एवं रिपोर्टों के आधार पर निम्नलिखित मुख्य अधिनियम पास किए गए थे-

दि रेलिजस एंडाउमेंट्स ऐक्ट 1863
भारत कंपनी अधिनियम 1866
दि जनरल क्लाजेज एक्ट 1868
विवाह विच्छेद अधिनियम 1869
भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872
भारतीय संविदा अधिनियम 1872 उपर्युक्त सभी अधिनियम एच.एस. मैन तथा जे.एफ. स्टीफेन के कार्यकाल में पास हुए थे। स्टीफेन के बाद लार्ड हाय हाउस विधि सदस्य नियुक्त हुए थे। इनके कार्यकाल में विशिष्ट अनुताप अधिनियम 1877 (Specifie Rcl Cf At) बना था। इन्हीं के कार्यकाल में निम्नलिखित सैद्धांतिक विधियों को संहिताबद्ध करने का सुझाव रखा गया था-
न्यास विधि (Trust)

सुख भोगविधि (Eascments)

जलोढ़ और बाढ़ से संबंधित विधि (Alluvion and Diuvition)

मालिक और नौकर से संबंधित विधि

परक्राम्य विलेख (Negotiable Instrument) से संबंधित विधि

अचल संपत्ति के हस्तांतरण से संबंधित विधि।

चतुर्थ विधि आयोग (Fourth Law Commission)

ब्रिटिश भारत में ‘चतुर्थ विधि आयोग’ की स्थापना 11 फरवरी, 1879 को की गई।

इस आयोग में तीन सदस्य थे।

आयोग का मुख्य कार्य तृतीय विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित विधियों की जाँच करना तथा अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था।

आयोग की सिफारिशों के परिणामस्वरूप भारतीय विधान मंडल ने निम्नलिखित विधियों को पास किया था-

परक्राम्य विलेख अधिनियम, 1881
प्रोबेट एंड एडमिनिस्ट्रेशन ऐक्ट 1881
न्याय अधिनियम, 1882
संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम1882
सुखाधिकार अधिनियम 1882

1912 ई. में चार ऐक्ट पास किए गए थे-

सहकारी समिति अधिनियम
पागलपन (Linuty) अधिनियम
भविष्य बीमा समिति अधिनियम
भारतीय जीवन बीमा कंपनी अधिनियम

चतुर्थ विधि आयोग की समाप्ति के साथ ही ब्रिटिश काल में विधि आयोगों द्वारा संहिताकरण का युग समाप्त हो गया।

शेष काल (14 अगस्त, 1947) तक में विधायन कार्य मुख्य रूप से भारत सरकार के विधायी विभाग द्वारा किया गया।

स्वतंत्र भारत में 19 नवंबर, 1954 ई. को लोकसभा में एक गैर-सरकारी प्रस्ताव के अंतर्गत एक विधि-आयोग बनाने की सिफारिश की,

सरकार द्वारा इसे स्वीकार करते हुए 5 अगस्त, 1955 ई. को तात्कालिक विधि मंत्री सी.सी. विश्वास ने लोकसभा में विधि आयोग की नियुक्ति की घोषणा की थी।

इस आयोग को पंचम विधि आयोग कहा जाता है।

श्री मोतीलाल चिमणलाल सीतलवाड़ इसके चेयरमैन थे और इसमें 11 सदस्य थे।

इसके समक्ष दो मुख्य कार्य रखे गए।

एक तो न्याय शासन का सर्वतोमुखी पुनरवलोकन और उसमें सुधार हेतु आवश्यक सुझाव,

दूसरा प्रमुख केंद्रीय विधियों का परीक्षण कर उन्हें आधुनिक अवस्था में उपयुक्त बनाने के लिए आवश्यक संशोधन प्रस्तुत करना।

भारतीय विधि आयोग, एक गैर-सांविधिक निकाय और गैर वैधानिक निकाय है।

यह भारत सरकार के आदेश से गठित एक कार्यकारी निकाय है।

इसका प्रमुख कार्य है, कानूनी सुधारों हेतु कार्य करना।

22 वां विधि आयोग (22nd Law Commission)

देश के 22वें विधि आयोग के गठन हेतु केन्द्रीय मंत्रिमण्डल ने 19 फरवरी, 2020 को अनुमति प्रदान कर दी है। इसका कार्यकाल भारत के राजपत्र में गठन के आदेश के प्रकाशन की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के लिए होगा। इस संबंध में जारी एक संक्षिप्त अधिसूचना में कहा गया है-

‘‘आधिकारिक गजट में इस आदेश के प्रकाशन की तिथि से लेकर तीन साल की अवधि के लिए भारत के 22वें विधि आयोग के गठन को राष्ट्रपति की मंजूरी दी जाती है।’’
इससे पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बलबीर सिंह चौहान की अध्यक्षता वाले 21वें विधि आयोग (Law Commission) का कार्यकाल 31 अगस्त, 2018 को समाप्त हो गया था।

22वे विधि आयोग में निम्नलिखित शामिल होंगे-

(i) एक पूर्णकालिक अध्यक्ष (सामान्यता उच्चतम न्यायालय का कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का कोई सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होता है।)
(ii) सदस्य सचिव सहित चार पूर्ण कालिक सदस्य।
(iii) कानूनी मामलों के विभाग के सचिव (पदेन सदस्य)।
(iv) सचिव, विधायी विभाग के सचिव (पदेन सदस्य)।
(v) अधिकतम पाँच अंशकालिक सदस्य।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की 19 फरवरी की बैठक में लिए गए निर्णय के तहत यह आयोग निम्नलिखित कार्य करेगा।

(i) यह ऐसे कानूनों की पहचान करेगा, जिनकी अब तक कोई आवश्यकता नहीं है,जो अब अप्रासंगिक है और जिन्हें तुरन्त निरस्त किया जा सकता है।

(ii) डायरेक्टिव प्रिंसीपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी के प्रकाश में मौजूदा कानूनों की जाँच करना तथा सुधार के तरीकों के सुझाव देना और नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने के लिए आवश्यक कानूनों के बारे में सुझाव देना तथा संविधान की प्रस्तावना में निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करना।

(iii) विधि और न्याय प्रशासन से संबंधित किसी भी विषय पर विचार करना और सरकार को अपने विचारों से अवगत कराना, जो इसे विधि और न्याय मंत्रालय के माध्यम से सरकार द्वारा सान्द्रण किया गया हो।

(iv) विधि और न्याय मंत्रालय के माध्यम से सरकार द्वारा अग्रेषित किसी बाहरी देश को अनुसधान उपलब्ध कराने के अनुरोध पर विचार करना।

(v) गरीब लोगों की सेवा में कानून और कानूनी प्रक्रिया का उपयोग करने के लिए आवश्यक उपाय करना।

(vi) सामान्य महत्त्व के केन्द्रीय अधिनियमों को संशोधित करना ताकि उन्हें सरल बनाया जा सके और विसंगतियों, संदिग्धताओं और असमानता को दूर किया जा सके। अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने से पहले आयोग नोडल मंत्रालय/विभागों तथा ऐसे अन्य हितधारकों के साथ परामर्श करेगा, जिन्हें आयोग इस उद्देश्य के लिए आवश्यक समझे उपर्युक्त के अतिरिक्त यह आयोग केन्द्र सरकार द्वारा इसे सौंपे गए या स्वतः संज्ञान पर विधि में अनुसंधान करने व उसमें सुधार करने, प्रक्रियाओं में देरी को समाप्त करने मामलों को तेजी से घटाने, अभियोग की लागत कम करने के लिए न्याय आपूर्ति प्रणालियों में सुधार लाने के लिए अध्ययन और अनुसंधान भी करेगा।

 

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